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The story of Srikalahasti (Vayu Lingam)

The story of Srikalahasti is deeply rooted in Hindu mythology, with two prominent legends associated with this sacred place. On the banks of the Swarnamukhi River, there is a Shiva Linga in the forest where, a spider named Sri, a serpent named Kala, and an elephant named Hasti used to worship Lord Shiva in their own unique ways every day. The town of Srikalahasti derives its name from these ardent devotees. Sri, the spider, would weave beautiful, shiny cobwebs around the Shiva Linga. Kala, the serpent, would destroy these cobwebs and offer gemstones to Lord Shiva. Hasti, the elephant, would remove the gemstones and perform a water abhishek (ritual bath) with his trunk, offering flowers and leaves to the Lord. Each devotee would become upset when they saw their offerings destroyed by the others. One day, they decided to wait and observe who was responsible. This led to a confrontation between Sri and Kala, resulting in Sri's death. When Hasti arrived, Kala slid into Hasti's trun...

प्यार और खूबसूरती की व्याख्या !

मुझे उसे देखना पसंद है,  और उसे चांद की तरह दिखना पसंद है ! वो भी अपने दाग नहीं छुपाती,  आंखों में काजल माथे पर बिंदी नहीं लगाती, नरम होठों को उन्हीं के हाल पर छोड़ देती है,  मुस्कुराते ही समाज के सारे बांध तोड़ देती है, उसे कौन सिखाए संजना संवरना,  बदल ना जाए इस दुनिया का हाल वरना, मैं खुश हूं कि वो आईने से अपना हाल नहीं पूछती,  ये, वो, हां, नहीं बेफिजूल सवाल नहीं पूछती, सोचो अगर वो आंखों में काजल लगा ले,  एक दफा बस अपने उलझे बालों को सुलझा ले, फिर ये जमाना अपना रुख ना बदल दे,  ये हवाएं रुक ना जाए उसे देखने को कहीं! मैने जबसे उसे देखा है मैं हूं वहीं ! उसे देखा है जबसे होश आने लगा है, जमाने का सारा खौफ जाने लगा है, उसे कोई तोहफा देने को जी चाहता है, मगर उसके लायक कुछ कहां आता है, वो माथे पर बिंदी गालों पर रूज नहीं लगाती, वो कानों को झुमके के तले नहीं दबाती, उसे उड़ना पसंद है सोचता हूं उसको हवाएं दे दूं,  उसके पंखों को दिल की सदाये दे दूं, फिर सोचता हूं कि वो क्या करेगी मेरे इन फिजूल इशारों का, उसकी हँसी का तो अपना कारोबार है बहारों का, उसे मेरी ज...

क्या तुम मुझे कभी समझ पाओगी क्या?

तुमसे मिलने के ख्वाब देखता हूं,  मेरे ख्वाब को तुम हकीकत बना पाओगी क्या? बहुत गलतियां करता हूं, तुम कभी मुझे संभाल पाओगी क्या ? तुम मुझे देखो और मैं खामोश हो जाऊं, तो तुम मेरी खामोशी की वजह समझ पाओगी क्या ? कह दूं तुम्हे सीधा मेरे दिल की बात, तो क्या तुम भी अपने दिल की बात बताओगी क्या ? मैं जितना तुम्हे चाहता हूं, क्या तुम भी मुझे कभी उतना चाह पाओगी क्या ? मेरे दिल में सिर्फ तुम्हारी ही जगह है, तुम भी अपने दिल में मेरे लिए जगह बना पाओगी क्या ? क्या तुम कभी मुझे अपना बना पाओगी क्या? क्या तुम कभी मुझे समझ पाओगी क्या ?

तुम अब मेरे नहीं हो!

✍✍✍✍✍ तुम मेरे होकर भी अब मेरे नहीं हो, ये मलाल जिंदगी भर अब जायेगा नही ! जैसे छोड़ कर चले जाते है परिंदे आशियां अपना, वैसे तुम मुझे छोड़ कर जाओगे सोचा नहीं ! पास रह कर भी दूरियां है बहुत, ये फासला भी कभी बढ़ेगा सोचा नहीं ! तस्वीरें आज भी है तुम्हारी मेरे फोन में, ये महज़ एक तस्वीर रह जायेगी कभी सोचा नहीं ! तुम्हारे साथ बितानी थी पूरी जिंदगी अपनी, तुम से अलग होकर जीना भी पड़ेगा कभी सोचा नहीं ! ✍✍✍✍✍

यूसीसी (अनुच्छेद 44) : अँग्रेजों के 'बांटों और राज करो’ षड्यंत्र को तोड़कर भारत के सभी नागरिकों को समान अधिकार देने का प्रयास

कहने के लिये भारत का संविधान सेकुलर है किन्तु अलग अलग पंथ के नागरिकों के लिये अलग अलग अधिकार देने वाले कानून बने ।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंग्रेजों के जमाने के उन कानूनों को बदलने का अभियान चलाया हुआ है जो या अब अनुपयोगी हो गये हैं अथवा भारतीय समाज में विभेद पैदा करने वाले हैं। यूसीसी लागू होने के बाद भारत में सभी नागरिकों को समान सामाजिक अधिकार प्राप्त होगें। विशेषकर उन वर्ग समूहों में भी महिलाओं को सम्मान और विकास के समान अवसर मिलेगें जिनमें महिलाओं का शोषण की सीमा तक उपेक्षा होती है। मोदी सरकार ने अंग्रेजों के जमाने के कानूनों को समाप्त करने का अभियान छेड़ा हुआ है। अंग्रेजी के कोई दो सौ कानून ऐसे है॔ जो स्वतंत्रता सतहत्तर वर्ष बीत जाने के बाद भी लागू है॔। इनमें से एक सौ पैंतीस ऐसे कानूनों समाप्त कर दिया है जिनके उपयोग की कोई आवश्यकता नहीं रह गई थी। इसी अभियान के अंतर्गत अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में यूसीसी लागू करने की घोषणा की है। इसकी शुरुआत उत्तराखंड से हो गई। यह कानून भारतीय सामाज जीवन के उस विसंगति को दूर करने वाला है जो अंग्रेजों ने भारतीय समाज में विभेद ...

कैसे कहें कितने खास हो तुम!

कैसे कहें कितने ख़ास हो तुम, कि प्यार का एहसास हो तुम। सागर घूंट में पी लिया फिर भी, बुझती नहीं, वो प्यास हो तुम। फासले मीलों के रहे दरमियां, दिल में रहते हो पास हो तुम। अंधेरी रात में रौशनी करे जो, जलते दिए सी आस हो तुम। बेस्वाद ज़िन्दगी थी पहले मेरी, तुम आए लगा मिठास हो तुम। यूं फ़ना हुए तेरी मुहब्बत में कि, मेरी इस रूह का लिबास हो तुम।

हर रात चाँदनी होती !

उन सर्द रातों की सिहरन में तुम्हारे मुखड़े की रोशनी होती। तुम होते तो दिन सुनहरे होते और हर रात चाँदनी होती।। अधर रखो अपने, मेरे अधरों पर अब इतने भी सवाल ना करो। बाहों की चादर में सिमट जाओ रिवाजों का ना ख्याल करो। नींद, सपने, वस्ल, इरादे, वादे इन सब से दुश्मनी  होती। तुम होते तो दिन सुनहरे होते और हर रात चाँदनी होती। मेरी साँसों को तुमने साँसें दे कर मेरे भीतर का अनहद चूम लिया। तुझ संग मेरा नाम जुड़ जाने से मेरा हर अधूरापन झूम लिया। जब आँखों में जगते इक-दूजे के हमारी सारी बातें रेशमी होती। तुम होते तो दिन सुनहरे होते और हर रात चाँदनी होती ।

तुम फिर मिलना मुझे !

सच पूछो तो "तुम्हारा यूँ अचानक से चले जाने की ख़बर, ऐसे लगा जैसे गंगा आरती के बाद घाट का सूनापन" वक्त शायद फिर करवट ले , शायद हम फिर कभी मिलें , कब ? कैसे ? कहां ? कुछ नहीं पता, पर जब हम मिलेंगे तब मैं देखूंगा सच बोलती तुम्हारी उम्मीद भरी आंखों को , झूठ बोलते तुम्हरे उन रूखे लफ्ज़ों को, और बेबसी से थरथराते हुए मेरे मन को। अगर मैं हँस दूं तो समझना कि वो एक छलावा है, अगर मुस्कुरा दूं तो समझना तुम्हारे साथ की खुशी, अगर चुप बैठा रहूं तो समझना की बहुत कुछ कहना है, हां शायद वक्त भी कम पड़ जाए , पर अगर फ़िर कभी आना तो मिलना घड़ी की टिक टिक से परे। कम से कम इतना की वापस जाते वक्त तुम्हारे बालों की खुशबू रह जाए मेरी कमीज़ पर। "हां बस इतना..इतना ही।" कुल्हड़ की गर्म चाय, गंगा का पानी बनकर , तुम मिलना फिर मुझसे एक याद भरी कहानी बनकर.! तुम मिलना फिर मुझसे मेरे जीवन की एक निशानी बनकर.!

अज़ीब रिश्ता

हाँ ! मेरा रिश्ता सिर्फ जिस्मानी था तुमसे, शायद इसलिए मुझे अब तक याद हैं सिर्फ़ जिस्मानी चीजें, जैसे तुम्हारी उम्मीद भरी आँखें , तुम्हारे रूखे होंठ, तुम्हारे पैरो की वो उंगलियाँ और वो सुबह का अनसुलझे बालों वाला तुम्हारा हसीन चेहरा। हाँ मुझे इश्क़ तो नहीं तुमसे पर, किसी और के साथ तुम्हारे होने का खयाल,  एक अजीब तकलीफ़देह एहसास देता है, ठीक से बयां करने लायक भी नहीं.. की आखिर कैसा! कितना ! और क्यों है ये अजीब एहसास। बस एक अजीब सा अलगाव, एक बेचैनी है उन स्मृतियों में। जिस दिन तुम भागते भागते थक जाओगे इस ज़िंदगी के खेल में , उस दिन एक शख़्स तुम्हारी थकी हुई आँखों पर फेरेगा अपनी उंगलियों को , उसका कंधा बनेगा तुम्हारी छत , और उसकी गोद तुम्हारा नर्म मखमली बिस्तर। तुम चुनना प्रेम के सबसे सरल रूप को, जो बड़े वचनों और सौगंध से रहित हो, जहाँ कोई छल, कोई बड़े वादे ना हों। तुम्हारे चेहरे पर बिखरती मुस्कान से, एक बार फ़िर "जी उठेगा ये हर्ष, पहले कि तरह !" ख़ुदा-ना-ख़्वास्ता कभी दोबारा इश्क़ हुआ तुम्हें , तो सबसे पहले तुम पूछ लेना बस एक बात, "कि घर वाले मान जायेंगे ना...?"

काश कोई समझें जज़्बात इस दुनियाँ में

काश कोई समझें जज़्बात इस दुनियाँ में हर कोई छोड़ देता हैं हाथ इस दुनियाँ में होते हैं कई लोग हर शाम इस महफ़िल में सुबहें छोड़ देते हैं सब साथ इस दुनियाँ में शायद सो जाउ तो कुछ राहत मिले मेरे ख़्यालों को पर हुई नहीं ना जाने क्यों रात इस दुनियाँ में मुकम्मल था एक जहां तेरे होने से देख अब कोई नहीं तेरे बाद इस दुनियाँ में वैसे तो पहलें भी हुए हैं कई लोग बेवफ़ा पर अब होती है सिर्फ़ तेरी बात इस दुनियाँ में

एक दोस्त थी मेरी ☹️

एक दोस्त थी मेरी, जो मेरे चेहरे की मुस्कान थी जिससे लगभग हर रोज बातें हो जाती थी  जो बनकर हँसी मेरे चेहरे पर आ जाती थी  जो करती थी कद्र और फिक्र मेरी  वो एक प्यारी सी लड़की थी दोस्त मेरी  उसकी बातों से सुकून सा मिल जाता था  जब वो नहीं करती थी बात तो दिल उदास सा हो जाता है  जब वो करती थी बात तो दिल उसकी बातों में खो जाता था  वक्त का पता ही नहीं चलता था जब उससे बात होती थी  उसके ही मैसेज से सुबह होती उसी के मैसेज से रात आती थी  ढेर सारा मजाक होता था,  मुझे बस उससे ही बातें करने का मन होता था  वो जब भी उदास होती थी तो मुझे बहुत अजीब सा लगता था  वो मुझसे बहुत दूर रहती थी पर फिर भी सब करीब सा लगता था  ऐसा नहीं है कि हमारे बीच लड़ाइयाँ नहीं होती थी  पर जितना वो जानती थी मुझे कोई और नहीं जानता था  बस एक दुआ थी कि हमारी दोस्ती यूंही बरकरार रहे  वो एक दोस्त थी मेरी, जो अब कहीं खो गयी!!

हाँ पहाड़ों पर इश्क़ फरमाया हमने 🥰

हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने,  बहुत दूर तक साथ चले,  बहुत देर तक साथ चले,  हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने... चलते चलते जब मेरी छोटी उँगली तुम्हारे हाथो से टकराई  तो लगा के मेरे ख़्याबों को एक सहमा असमां मिल गया हो,  बैठे हुए गाड़ी में वो तिरछी निगाह से तुम्हें देखा  तो पहाड़ कुछ फीके से लगने लगे। वो वहाँ तक चले जाने की ज़िद,  जहाँ शायद पहले जाने की हिम्मत नहीं थी,  तुम वहाँ भी लेकर चले गए मैं वहाँ भी चला गया।  पहाड़ के सबसे ऊँचे पेड़ पर बैठ कर  हम दोनो ने अपने अपने घर ये कह के बाँट लिए  कि तुम भी आना कभी दीवार लांघ कर मेरे खेतों की सब्जियाँ खाना,  मैं भी इस उमीद में खुश सा हो गया  कि शायद ये सफ़ेद पेड़ वाला घर अपना हो जाए कभी। सब कुछ तय करने के बाद जब वापस उतरे पहाड़ से  तो ऐसा लगा वो घर किराए का था बस कुछ पल का और वो पीछे छूट गया,  जैसे जैसे पहाड़ ढलते गए,  तुम और मैं डरे हुए सहमे हुए सच्चाई से रूबरू  एक दूसरे को समझाने लगे  कि हाँ हम पहाड़ पे रहते नहीं घूमने आते है,  छूट गयी वो बातें...

बचपन को याद करते हुए एक नज़्म

वो बचपन की शाम अब तक उधार है, अपने खिलौने देखे बिना जी बेक़रार है, ना थी फ़िक्र ग़म की ना ख़ौफ़ किसी बात का, चारों तरफ ही बस खुशियों का बाज़ार है, खेल-कूद से ही ज़िन्दगी का मक़सद था, वो सौंधी सी मिट्टी कितनी खुशबूदार है, गिरकर उठना और फिर उठकर दौड़ना, अब कहाँ वो हिम्मत और हौसला बरक़रार है, चोट लगने पे फूट-फूटकर रोते रहते, यूँही नहीं आज बदन पे घाव हज़ार है, ज़िद थी कि बस यही और यही चाहिए, दिल है कि अब हर चीज़ पे समझदार है, लिपट जाते थे माँ के आँचल से हम, और फिर लगता था की दुनिया बेकार है, स्कूल में भी कहाँ मन लगता था अपना, आख़िर कब छुट्टी होगी बस इसका इंतेज़ार है, वो दोस्त-अहबाब जो पल में रूठ जाते थे, उनसे ही तो ज़िंदगी में आज भी प्यार है, कोई लौटा दे वो ख़ूबसूरत बचपन मेरा, सदियों से ये दिल जिसका तलबगार है... बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !!

बांसगाँव का इतिहास ! 300 वर्षों से चली आ रही अनोखी परंपरा

कुल की रक्षा के लिए हम सर तक अपना कटवा देते है, सर के कटने पर भी हम धड़ से तलवार चलाते हैं, और हम उस कुल के वंशज है जिस कुल में. माँ भवानी के चरणों में किसी निर्बल की बलि नहीं , अपना उमड़ता हुआ गर्म रक्त चढ़ाते है ! भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गोरखपुर जिले का एक कस्बा और नगर पंचायत है । यह यहां बसे राजपूतों के लिए जाना जाता है। मूल रूप से, यह कहा जाता है कि इस स्थान पर प्राचीन काल में श्रीनेत राजपूतों का कब्जा था, जो अभी भी कुलदेवी के प्राचीन मंदिर में स्वरक्त बलिदान (रक्त) चढ़ाने के लिए अश्विन के महीने में इकट्ठा होकर अपनी विजय का जश्न मनाते हैं। श्रीनेत राजपूत मूल रूप से श्रीनगर, उत्तराखंड के निवासी हैं। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि श्रीनेत वंश के किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को राजा विक्रमादित्य ने ये पदवी दी थी जिससे यहां के लोग "शिरनेत" या  "श्रीनेत" कहे जाने लगे । कई पीढ़ियों के बाद चंद्रभाल के वंशज मकरंद सिंह श्रीनगर से गोरखपुर आए, यहाँ इन्हें रियासतों से बहुत से गाँव मिले जब इनका खानदान बढ़ा तब ये और भी गाँवों में फैलने लगे और यहां के लोग बांसगाँव के बाबू साहब क...

काश तू भी मेहमान की तरह आया होता

काश तू भी मेहमान की तरह आया होता रंजिशों का दौर यूं न कभी आया होता। दिल था जिद किसी बात पे कर बैठा दिल को किसी ने तो कुछ समझाया होता। हमने दर्द को लफ़्ज़ों का जामा दे दिया थोड़ा सलीके से तू भी तो पेश आया होता। पहले कभी इस कद्र तन्हा नही हुए थे हम काश दर्द दिल का लबों पे न आया होता। मै उजाले शहर के इस घर तक लाता कैसे पर्दा शब ए ग़म से भी तो उठाया होता। कोई समझा न समझेगा हर्ष तुझको अपने आप को आप ही समझाया होता।

प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी

प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी। हाँ सखे पीड़ा मिलेगी, बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी! आज बंधन लग रहें जो वह तो केवल एक मृषा है, मोह का अलोक है यह देह की किंचित तृषा है। नित्य भय मे बांधे रखे अल्प मृत्यु द्वार है यह, मेनका की छल कथा का बस समझ लो सार है यह। हो ना पाए बुद्ध गर तुम और लिप्सा में समाए, स्वयं से केवल द्वंद होगा अश्कों की क्रीड़ा मिलेगी। प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी। सुख समझते हो जिसे तुम कष्ट का कारक बनेगा, आत्मा के पोर रिस कर पीर का वाहक बनेगा। बुन लिया जो तुमने जीवन स्वार्थ और आसानियो में, श्वास अंतिम तुम भरोगे देखना फिर ग्लानियों में। चित्त स्थिर कर न पाए यदि जगत की लालसा में, फिर तुम्हें अनहद दुखों की महज़ बीड़ा मिलेगी। प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी। फूलते हो आज बल पर कल अशक्ति, दीन होगे, त्याग देगा प्राण तन को फड़फड़ती मीन होगे। कामना ऐसी ज़हर है इंद्रियों को मार देगी, भ्रष्ट कर देगी ह्रदय को लोभ को आगर देगी। स्वल्प जीवन की सनातन आत्मा दूषित हुई गर, फिर किसी भागीरथी से भी नहीं तृणा मिलेगी। प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड...

अद्भुत जिंदगी !

यदि आपने :  बखरी की कोठरी के ताखा में जलती ढेबरी देखी है। दलान को समझा है। ओसारा जानते हैं। दुवारे पर कचहरी (पंचायत) देखी है। राम राम के बेरा दूसरे के दुवारे पहुंच के चाय पानी किये हैं। दतुअन किये हैं। दिन में दाल-भात-तरकारी खाये हैं। संझा माई की किरिया का मतलब समझते हैं। रात में दिया और लालटेम जलाये हैं। बरहम बाबा का स्थान आपको मालूम है। डीह बाबा के स्थान पर गोड़ धरे हैं। ताल के किनारे और बगइचा के बगल वाले पीपर और स्कूल के रस्ता वाले बरगद के भूत का किस्सा (कहानी) सुने हैं। बसुला समझते हैं। फरूहा जानते हैं। कुदार देखे हैं। दुपहरिया मे घूम-घूम कर आम, जामुन, अमरूद खाये हैं। बारी बगइचा की जिंदगी जिये हैं। चिलचिलाती धूप के साथ लूक के थपेड़ों में बारी बगइचा में खेले हैं। पोखरा-गड़ही किनारे बैठकर लंठई किये हैं। पोखरा-गड़ही किनारे खेत में बैठकर 5-10 यारों की टोली के साथ कुल्ला मैदान हुए हैं। गोहूं, अरहर, मटरिया का मजा लिये हैं अगर आपने जेठ के महीने की तीजहरिया में तीसौरी भात खाये हैं, अगर आपने सतुआ का घोरुआ पिआ है, अगर आपने बचपन में बकइयां घींचा है। अगर आपने गाय को पगुराते हुए देखा है। अगर ...

बचपन लौटा दो!

फिसल गया जो हाथ से वो वक़्त मुझे लौटा दो,  हे महादेव! वरना मेरी यादों से मेरा बचपन मिटा दो। बेफिक्र घूमता देख इनको बेइंतहा रश्क करता हूँ , मुझे तुम इन बच्चों के संग फिर से बच्चा बना दो। मिट्टी के मर्तबान में उन सिक्कों की धुन याद है,  यादों की गुल्लक से चंद लम्हें मुझे और दिला दो।  वो रंगीन बर्फ के ठेले, चाचा के चाट का स्वाद,  फिर जिंदगी का वही पुराना लज्जत वापस चखा दो।  हर वक़्त परेशान रहता हूं, खुद से बातें करता हूं,  मुझे इस दुनियादारी की बीमारी का इलाज बता दो।  तू रख मेरा सब कुछ, लेले मेरी सारी खुशियां,  बस एक बार उन गुज़िश्ता सालों को जिंदा करा दो। 

सुनो!

सुनो ! हाँ तुम्हारे मैसेज का ही इन्तज़ार रहता है  गुज़रते हो जब तुम इन आँखों के सामने से  तो ये नज़रे तुम पर आकर ठहर जाती है  और जिस अदा से तुम छुप छुप के देखा करते हो ना  कसम खुदा की मुझे खुद से मुहब्बत हो जाती है  हाँ तुम्हारे एक View के लिए अक्सर मेरे Whatsapp का status लगता है  और हाँ जो तुम ये पूछते हो ना कि ये किसके लिए लिखा  तो हाँ वो तुम्हारे लिए ही लिखा होता है  मैं ये नहीं जानता कि तुम मेरे लिए क्या हो बस इतना समझ जाओ  मैं डूब जाऊँ जिन ख्यालों में उन ख़्यालों की एक वजह हो तुम कभी कभी जी करता है, तुम्हें अपनी बाहों में कैद कर लूं । कभी कभी जी करता है , तेरे दामन में सिर रख दो पल रो लूँ । कभी कभी जी करता है , तेरी जुल्फों में छिप सवेरे को शाम कर दूँ । लेकिन जब जब जी करता है , तब तब दिमाग कुछ यूं बयान करता है । अगर वो बाहों में कैद हो भी गए ,  तो उस कैदी को और जुर्म करने से रोक पाओगे कैसे? अगर उसके दामन में दो पल रो भी लिए , तो उसके पहले से गिले दामन में तुम तैर पाओगे कैसे? अगर उसकी जुल्फों में छिप भी गए , तो उनकी काली घटाओं से खु...

तुम धड़कन बनोगी क्या?

मैं चाहकर भी नहीं बोल पाता जो, तुम मेरी वो अधूरी बात बनोगी क्या? चुपचाप सा हूँ मैं बहुत, तुम अल्फाज़ बनोगी क्या? फीके से है होंठ मेरे, इनकी मुस्कुराहट बनोगी क्या? एक प्यारा सा दिल है मेरे पास, तुम धड़कन बनोगी क्या ? कुछ सपने है मेरे पास, उनकी उड़ान बनोगी क्या? तेरे हिस्से के ग़म मैं सह लूँगा, तुम मेरी ख़ुशी बनोगी क्या ? दर्द बहुत है मेरे जीवन में, तुम हमदर्द बनोगी क्या? वादे तो सभी हजार करते हैं, तुम निभाने वाली बनोगी क्या? मैं जिद्दी बहुत हूँ, तुम मेरी जिद बनोगी क्या? मुझे नींद बहुत कम आती है, तुम सुलाने वाली बनोगी क्या? मुझे तुम्हें बेइंतहा मुहब्बत है, तुम भी मुझसे करोगी क्या? अकेला चलने वाला मुसाफिर हूँ मैं, मेरी हमसफर बनोगी क्या?