बचपन को याद करते हुए एक नज़्म

वो बचपन की शाम अब तक उधार है,
अपने खिलौने देखे बिना जी बेक़रार है,

ना थी फ़िक्र ग़म की ना ख़ौफ़ किसी बात का,
चारों तरफ ही बस खुशियों का बाज़ार है,

खेल-कूद से ही ज़िन्दगी का मक़सद था,
वो सौंधी सी मिट्टी कितनी खुशबूदार है,

गिरकर उठना और फिर उठकर दौड़ना,
अब कहाँ वो हिम्मत और हौसला बरक़रार है,

चोट लगने पे फूट-फूटकर रोते रहते,
यूँही नहीं आज बदन पे घाव हज़ार है,

ज़िद थी कि बस यही और यही चाहिए,
दिल है कि अब हर चीज़ पे समझदार है,

लिपट जाते थे माँ के आँचल से हम,
और फिर लगता था की दुनिया बेकार है,

स्कूल में भी कहाँ मन लगता था अपना,
आख़िर कब छुट्टी होगी बस इसका इंतेज़ार है,

वो दोस्त-अहबाब जो पल में रूठ जाते थे,
उनसे ही तो ज़िंदगी में आज भी प्यार है,

कोई लौटा दे वो ख़ूबसूरत बचपन मेरा,
सदियों से ये दिल जिसका तलबगार है...

बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !!

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