हाँ पहाड़ों पर इश्क़ फरमाया हमने 🥰

हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने, 
बहुत दूर तक साथ चले, 
बहुत देर तक साथ चले, 
हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने...
चलते चलते जब मेरी छोटी उँगली तुम्हारे हाथो से टकराई 
तो लगा के मेरे ख़्याबों को एक सहमा असमां मिल गया हो, 
बैठे हुए गाड़ी में वो तिरछी निगाह से तुम्हें देखा 
तो पहाड़ कुछ फीके से लगने लगे।

वो वहाँ तक चले जाने की ज़िद, 
जहाँ शायद पहले जाने की हिम्मत नहीं थी, 
तुम वहाँ भी लेकर चले गए मैं वहाँ भी चला गया। 
पहाड़ के सबसे ऊँचे पेड़ पर बैठ कर 
हम दोनो ने अपने अपने घर ये कह के बाँट लिए 
कि तुम भी आना कभी दीवार लांघ कर मेरे खेतों की सब्जियाँ खाना, 
मैं भी इस उमीद में खुश सा हो गया 
कि शायद ये सफ़ेद पेड़ वाला घर अपना हो जाए कभी।

सब कुछ तय करने के बाद जब वापस उतरे पहाड़ से 
तो ऐसा लगा वो घर किराए का था बस कुछ पल का और वो पीछे छूट गया, 
जैसे जैसे पहाड़ ढलते गए, 
तुम और मैं डरे हुए सहमे हुए सच्चाई से रूबरू 
एक दूसरे को समझाने लगे 
कि हाँ हम पहाड़ पे रहते नहीं घूमने आते है, 
छूट गयी वो बातें नदी के किनारे जहाँ बैठ कर हमने तारे बाँटे थे।

अब देखो तुम कही मैं कही है
तारे भी जो बाँटे थे कुछ अलग से चमकने लगे है ,
इस शहर की धूप तुम्हें भी तो खारी लगती है, 
चलो ना झूठ ही सही एक बार फिर चले, इश्क़ फ़रमाए पहाड़ों पे। 
हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने ....

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