बांसगाँव का इतिहास ! 300 वर्षों से चली आ रही अनोखी परंपरा

कुल की रक्षा के लिए हम सर तक अपना कटवा देते है,
सर के कटने पर भी हम धड़ से तलवार चलाते हैं,
और हम उस कुल के वंशज है जिस कुल में.
माँ भवानी के चरणों में किसी निर्बल की बलि नहीं ,
अपना उमड़ता हुआ गर्म रक्त चढ़ाते है !

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गोरखपुर जिले का एक कस्बा और नगर पंचायत है । यह यहां बसे राजपूतों के लिए जाना जाता है। मूल रूप से, यह कहा जाता है कि इस स्थान पर प्राचीन काल में श्रीनेत राजपूतों का कब्जा था, जो अभी भी कुलदेवी के प्राचीन मंदिर में स्वरक्त बलिदान (रक्त) चढ़ाने के लिए अश्विन के महीने में इकट्ठा होकर अपनी विजय का जश्न मनाते हैं। श्रीनेत राजपूत मूल रूप से श्रीनगर, उत्तराखंड के निवासी हैं।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि श्रीनेत वंश के किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को राजा विक्रमादित्य ने ये पदवी दी थी जिससे यहां के लोग "शिरनेत" या  "श्रीनेत" कहे जाने लगे । कई पीढ़ियों के बाद चंद्रभाल के वंशज मकरंद सिंह श्रीनगर से गोरखपुर आए, यहाँ इन्हें रियासतों से बहुत से गाँव मिले जब इनका खानदान बढ़ा तब ये और भी गाँवों में फैलने लगे और यहां के लोग बांसगाँव के बाबू साहब के नाम से भी प्रसिद्ध है ।

क्षत्रियों की अपनी कुल देवी को ललाट के मध्य से रक्त निकालकर चढ़ाने की परंपरा ने यहाँ के लोगों के अंदर वीरता का भाव भर दिया। ललाट के मध्य में ऊर्ध्व चीरा लगाकर रक्त चढाने की परंपरा ऐसी ही है जैसे कि माँ दुर्गा का तीसरा नेत्र खोलना यानि वीरता की परमावस्था यानि चंडी रूप का धारण करना । ललाट पर ऊर्ध्व चीरा लगाकर माँ दुर्गा के तीसरे नेत्र यानि "श्री नेत्र" खोलकर वीरता के उस भाव को पूजने की प्रथा के कारण ही हमारे क्षत्रिय समाज का नाम "श्रीनेत" पड़ा । 

परंपरा के अनुसार, श्रीनेत परिवारों की महिलाएं अष्टमी के दिन देवी दुर्गा मंदिर में पूजा करने जाती हैं और श्रीनेत परिवारों के पुरुष गांव में मौजूद मंदिर में कुल देवी माँ दुर्गा को अपना रक्त नवमी के दिन चढ़ाकर अभिषेक करते हैं। इसे 'बलि' प्रथा के नाम से भी जाना जाता है।

इस प्रथा में 12 दिन के बच्चे से लेकर बूढे़ तक सभी शामिल होते हैं और एक ही छुरे से सैकड़ों लोगों के शरीर पर हल्का सा वार कर खून निकाला जाता है। निकलते हुए खून को बेल पत्र से साफ कर रक्त को माँ दुर्गा के चरणों में अर्पित किया जाता है तथा कटे हुए स्थान पर राख और भभूत लगा दिया जाता है। लगभग 40 हजार से ज्यादा की आबादी वाले क्षत्रिय बाहुल्य बांसगांव में नवरात्र के अंतिम दिन मां दुर्गा मंदिर पर नवमी के दिन करीब 15 से 20 हजार श्रीनेतवंशी जुटते हैं और शरीर के नौ अंगों के रक्त से अभिषेक करते हैं। देश-विदेश में रहने वाले यहां के लगभग 90 फीसदी स्थानीय लोग इस दिन गांव वापस जरूर आते हैं। महिलाओं अथवा लड़कियों का इस दौरान वहां जाना वर्जित होता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बलि के लिए किसी के साथ कोई जबर्दस्ती नहीं की जाती। लोग अपनी आस्थानुसार स्वत: ही इसमें शामिल होते हैं।

वहीं महाष्टमी को मां दुर्गा के दरबार में कड़ाही चढ़ाने की श्रीनेत वंशीय क्षत्राणियों में होड़ सी लगी रहती है। चारों तरफ धधक रहे रसोई गैस के छोटे सिलेंडरों पर पूड़ी हलवा बनाने के साथ ही महिलाओं के भक्तिगीत से पूरा वातावरण भक्तिमय सा बना रहता है। रात्रि में करीब ढाई घंटे तक मन्दिर के गर्भ गृह में पूजा पाठ व हवन आदि की परम्परागत धार्मिक अनुष्ठान पूरा करने के बाद 9.30 बजे मन्दिर के कपाट खुलते ही इंतजार में घंटों से पंक्तिबद्ध खड़ी क्षत्राणियां गर्भ गृह में बारी बारी से प्रवेश कर अपनी कुल देवी के चरणों में हलवा-पूड़ी, धार-कपूर, नारियल-चुनरी अर्पित कर अपने परिवार की सुख समृद्धि और स्वास्थ्य सहित मनोवांछित कामना को फलीभूत करने की प्रार्थना करती है। यह कार्यक्रम आधी रात तक चलता रहता है। 

युगों युगों से क्षत्रिय हमेशा एक योद्धा होता है, जो अपने देश और प्रजा की रक्षा करता है । मान्यता है कि सदियों से देश की सीमा पर तैनात कोई भी क्षत्रिय देश की रक्षा करते हुए उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती है। माँ भवानी का आशीर्वाद हमेशा उस पर रहता है।  यह प्रथा लगभग 300 वर्ष पुरानी है जो यहाँ का हर एक क्षत्रिय निभाता है।  कहा जाता है कि सबसे पहले कुल देवी को यहाँ का क्षत्रिय अपने ज्येष्ठ पुत्र की बलि देते थे । कुछ वर्षों बाद 21 दिन तक एक पैर पर खड़े होकर घनघोर तपस्या करने के बाद माँ भवानी को मनाया गया और फिर माता ने किसी के सपने में आकर स्वरक्त की बलि माँगी उसके बाद से ये प्रथा बनाई गयी कि 12 दिन के नवजात शिशु से लेकर बुजुर्गों को नियमानुसार अविवाहित को शरीर के एक अंग तथा विवाहित पुरुष को शरीर के 9 अंगों से खून निकाल कर माता का अभिषेक किया जाने लगा। 

आशा करता हूँ कि आपको बांसगाँव के क्षत्रियों का इतिहास पसंद आया होगा? माँ भवानी आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी करें।  

🙏 जय माता दी 🙏 जय माँ भवानी 🙏


हर्ष तारा सिंह 
बांसगाँव, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

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