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लता या लतिका

आँखों में शरारत, अंदाज़ में बेबाकपन, जैसे कोई अल्हड़ बचपन ... ये शर्म-ओ-हया, हाथों की कपकपाहट, धड़कनों की घबराहट, उसपर एक सुंदर प्यारी मुस्कराहट ... हाय तौबा ये उसका शबाब, खुशबू जैसे बगिया गुलाब, उसकी सादगी में भी ताज़गी ... ये अद्भुत नज़राना, कौन हो तुम, लता या लतिका, सुरसुन्दरी, परी या देवांगना ... तुमको खुदा ने बनाया है, या खुदा खुद को ही, ज़मीन पर ले आया है ... -- हर्ष तारा सिंह  ------ शब्दकोश------ बेबाकपन: निडरता  अल्हड: भोला  शबाब: जवानी  लता: अप्सरा  लतिका: आकाशिय अप्सरा 

मुस्कुराता चेहरा 😊

नींद खुलती है किसी ख्वाब से लड़ते हुए, एक मुस्कुराता चेहरा याद आता है जहन में चलते हुए । उबलने लगते हैं दिल में ख्वाब कई सारे, वो मुझसे पूछता है क्यूँ सवाल इतने सारे । हर पन्ना पलटता है माजी की किताब का, और हिसाब करता है मेरे हर गुनाह का । मुझसे जिरह भी करता है मेरी ही ओर से, फिर अपना फैसला सुनाता है जोर से । जला दो, दफन कर दो, या गम-ए-दुनिया में मिला दो, मेरी उन कशमकश यादों को चाहे दिल के हर पन्ने से मिटा दो । छिपा दो चाहे तुम मुझे किसी भी रोशनाई से, अपनी कहानियां लिखोगे तुम मेरी ही सिपाही से ।। -- हर्ष तारा सिंह  ------ शब्दकोश------ माजी: बीता कल  जिरह: हुज्जत करना  रोशनाई: स्याही, उजाला  सिपाही: अंधेरा 

वो घर लौटी तो खाली थी

उनकी वाह-वाही के बीच वो भूल गए ना जाने झूठ मैंने कितने कहे चमकीली सी एक परत लगाई दरारें दिल की सबसे छुपाईं दर-किनार अपने सुकून को कर आवाज़ में अपनी जुनून को भर कुरेदा कुछ पुराने ज़ख़्मों को बदनाम भी किया कुछ अपनों को ना नाम लिया न पता बताया कुछ बेवफ़ाओं को मैंने ख़ुदा बताया नज़रों से जिन्हें उतारा था नज़्मों में उन्हें सँवार दिया लफ़्ज़ों के ताने-बाने में जाने कितना वक़्त गुज़ार दिया हाँ बातों में मेरी ठहराव सा था पर दिल में उठ रहा सैलाब सा था कुछ शेर पढ़े, कुछ ख़याल सुने जो मतलब के थे, बस वही चुने महफ़िल में तो बड़ी मतवाली थी पर जो घर लौटी वो खाली थी।। -- हर्ष तारा सिंह 

इश्क़

दिल मेरा मुझे लौटा कर अहसान कहते हो,  अरे होश में आओ फ़रेबी किसे बेईमान कहते हो । सौदा ऐसा की मूल भी तुम्हारा और ब्याज भी तुम्हारा, ख़ुदा से डरो जो मोहब्बत को मेरी नुक्सान कहते हो । बिना चिंगारी के भी क्या उठता है धुआँ कभी, गलतियाँ अपनी छुपा कर मुझे नादान कहते हो । महकते फूलों को ख़ुद बेरहमी से झुलसा कर, अब इस गुलशन को सरेआम मसान कहते हो । लगेगी एक उम्र जनाब अब किसी और को चाहने में, इश्क़ करना नहीं आता गर इश्क़ को आसान कहते हो । -- हर्ष तारा सिंह 

सुनो अगर मैं अच्छा लगूँ

सुनो अगर मैं अच्छा लगूँ  तो थोड़ी देर साथ बैठ जाना , मतलब, चाहे झूठा ही सही  दो पल मुझसे इश्क़ फरमाना । क्यूंकि जो आपके लिए झूठ है  वो मेरे लिए है खुश होने का बहाना, सुनो अगर मैं अच्छा लगूँ  तो इश्क़ करके जरूर आजमाना ।। -- हर्ष तारा सिंह 

वो हँसती हुई लड़की ❤

वो हल्के भूरे बालों वाली लड़की कमाल करती है , काले कपड़े में लोगों का बुरा हाल करती है । न झूमके न कंगन, न बाली न लाली , अपनी सादगी से लोगों का कत्ल-ए-आम करती है । आशिकों की नजरें उसकी कमर से हटती नहीं , इतराके जो वो चलती है तो बवाल करती है । इश्क़ उसका अक्सर उससे ये सवाल करता है , सरकते आँचल पे क्या वो उसका ख्याल करती है । कश्मकश में बिताई है उसने वो रात हर्ष , उस शख्स की झुकी नजरें कितना सवाल करती हैं । -- हर्ष तारा सिंह 

इश्क और बनारस

मैं इश्क कहूँ, तू बनारस समझना मैं गंगा सी निर्मल, बहती निरंतर तू पत्थर वो अस्सी घाट का, मैं शीतल साहिल की रेत सी तर और तू चाँद वो ठण्डी रात का… मैं काशी की गलियों सी मग्न हर-पल तू देखता मुझे शांत उस शाम सा, मैं कुण्ड की लिए खूबसूरती खुद में तू लगता महादेव के भाँग सा… मैं बारिश के बाद की वो सोंधी खुश्बू तू कुल्हड़ वाली दो घूंट चाय सा, मैं मंदिर पे रंगे उस गेरूए सी तू लिए रंग वो नुक्कड़ के पान सा… मैं दशाश्वमेध की संध्या-आरती तो तू सुबह-ए-बनारस उस घाट का, मैं जैसे जायका वो चटपटे चाट की तू खट्टे लस्सी की हल्की मिठास सा… मैं संगमरमर वो मानस मंदिर की तू इनमें पड़े उस स्लेटी धार सा, मैं हाथों से जिसे पढ़ते गुजरती तू लगता वही उभार किसी दीवार का… मैं जैसे देव-दीपावली की जगमगाती कशिश और तू इसकी तरफ डोर कोई खिंचाव का, मैं तैरते-जलते दीपों सी उज्ज्वल और तू इन्हें लहराता जैसे कोई बहाव सा… मैं अंधियारे की वो पीतल सी रौशनी तू किनारे ठहरा एक मुसाफिर अंजान सा, मैं पंचगंगेश किनारे की वो मस्जिद और तू जैसे निकलता उससे अजान सा… मैं मन्नत किसी बंजारे की तो तू दुआ है कोई मुकम्मल सा, मैं मंदिर में पेड़ वो बरगद स...