वो घर लौटी तो खाली थी
उनकी वाह-वाही के बीच वो भूल गए
ना जाने झूठ मैंने कितने कहे
चमकीली सी एक परत लगाई
दरारें दिल की सबसे छुपाईं
दर-किनार अपने सुकून को कर
आवाज़ में अपनी जुनून को भर
कुरेदा कुछ पुराने ज़ख़्मों को
बदनाम भी किया कुछ अपनों को
ना नाम लिया न पता बताया
कुछ बेवफ़ाओं को मैंने ख़ुदा बताया
नज़रों से जिन्हें उतारा था
नज़्मों में उन्हें सँवार दिया
लफ़्ज़ों के ताने-बाने में
जाने कितना वक़्त गुज़ार दिया
हाँ बातों में मेरी ठहराव सा था
पर दिल में उठ रहा सैलाब सा था
कुछ शेर पढ़े, कुछ ख़याल सुने
जो मतलब के थे, बस वही चुने
महफ़िल में तो बड़ी मतवाली थी
पर जो घर लौटी वो खाली थी।।
-- हर्ष तारा सिंह
Comments
Post a Comment