वो
वो संगमरमर सी चमक लिए बैठी है चमेली-ग़ुलाब सी दमक लिए बैठी है, जो कानों की बाली है झुमक-झुमक मन में बस रही है जैसे ठुमक-ठुमक, जादू-वादू है उसकी निगाहों में सज रहा जैसे एक अंजुमन है अदाओं में सज रहा, संदली-संदली सा बदन तराशा हुआ सा सहरी शबनमी शीतल-कुहासा हुआ सा। ऐ काश! वो मुझसे एक बार बोल ले मासूम अदाओं से मुझको भी तोल ले, एक नग़मा रखूँगा उसकी ख़िदमत में उसी की दुआ में उसी की रहमत में, वो हुक्म करे मैं शागिर्द बन जाऊँगा इश्क़ की गली में मुर्शिद बन जाऊँगा, मैं ख़ुद की बिसात उसको पेश करूँगा मोहब्बत की सौगात उसको पेश करूँगा।