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वो

वो संगमरमर सी चमक लिए बैठी है चमेली-ग़ुलाब सी दमक लिए बैठी है, जो कानों की बाली है झुमक-झुमक मन में बस रही है जैसे ठुमक-ठुमक, जादू-वादू है उसकी निगाहों में सज रहा जैसे एक अंजुमन है अदाओं में सज रहा, संदली-संदली सा बदन तराशा हुआ सा सहरी शबनमी शीतल-कुहासा हुआ सा। ऐ काश! वो मुझसे एक बार बोल ले मासूम अदाओं से मुझको भी तोल ले, एक नग़मा रखूँगा उसकी ख़िदमत में उसी की दुआ में उसी की रहमत में, वो हुक्म करे मैं शागिर्द बन जाऊँगा इश्क़ की गली में मुर्शिद बन जाऊँगा, मैं ख़ुद की बिसात उसको पेश करूँगा मोहब्बत की सौगात उसको पेश करूँगा।

कभी कभी जी करता है

कभी कभी जी करता है,  तुम्हें अपनी बाहों में कैद कर लूं । कभी कभी जी करता है ,  तेरे दामन में सिर रख दो पल रो लूँ । कभी कभी जी करता है ,  तेरी जुल्फों में छिप सवेरे को शाम कर दूँ । लेकिन जब जब जी करता है ,  तब तब दिमाग कुछ यूं बयान करता है । अगर वो बाहों में कैद हो भी गए , तो उस कैदी को और जुर्म करने से रोक पाओगे कैसे? अगर उसके दामन में दो पल रो भी लिए , तो उसके पहले से गिले दामन में तुम तैर पाओगे कैसे? अगर उसकी जुल्फों में छिप भी गए , तो उनकी काली घटाओं से खुद को बचा पाओगे कैसे? -- हर्ष तारा सिंह 

मुहब्बत से पुकारा करो

मुझ पर इतना ना कहर तुम ढाया करो  मिला करो, ख्वाबों में ना सताया करो  दिल में छुपी या लबों पर रुकी हुई है  जो है अनकही, वो बात बताया करो  हर्ष सुनते हो, हर्ष सुनो ना कहके  तुम शहद जैसी मीठी आवाज सुनाया करो  सुबह सुबह हसीन मुस्कान दिख जाए  शगुन बनके मुझको नजर आ जाया करो  शाम को घर के लिए कदम रखूं जैसे ही  मुस्कराते हुए सामने आ जाया करो  जुल्फें उलझी हुई और पेचों वाली है मैं सुलझाऊं और तुम उलझाया करो  "हर्ष" कहके मुहब्बत से पुकारो  तुम ज़ज्बात छुपा के ना तड़पाया करो  -- हर्ष तारा सिंह 

सफलता - लक्ष्य - कामयाबी

जो दुनिया आपकी सफ़लता पर इर्द गिर्द घूमती है, वही दुनिया अपकी विफलता का फायदा उठाने के लिए तैयार रहती है । यहां हमारा लक्ष्य सिर्फ जीत होना चाहिए, क्यूंकि कामयाबी में कभी Full Stop नहीं होता, सिर्फ Comma होता है । कामयाबी कोई मंजिल नहीं है, कामयाबी एक सफर है, जो निरंतर चलते रहना चाहिए ।। - हर्ष तारा सिंह  IG- harsh.singh.shrinet

आज तुम्हें अपने शब्दों में लिखतें हैं

क्यूँ न आज तुम्हें अपने शब्दों में लिखतें हैं तुम्हारी आँखों को अपनी मुहब्बत लिखतें हैं नज़रें!!! जो झुकती हैं कभी इत्तेफ़ाक़ से मुझे देखकर तुम्हारी हया को अपनी बढ़ती धड़कन लिखते हैं धड़कन!!! जो बढ़ती है इक तेरे पास होने से तेरे इंतज़ार को अपनी तलब लिखतें हैं तेरी हँसी से जो रहते हैं शादाब-ए-गुलिस्तान उस बहार में तुझको जमाल-ए-याख लिखते हैं लिखतें हैं तुझे ख़्याल-ओ-ख़्वाब से परे हद्द-ए-नज़र से तुझे अपना आसमान लिखतें हैं क्यूँ न आज तुम्हें अपने शब्दों में लिखतें हैं तुम्हारी आँखों को अपनी मुहब्बत लिखतें हैं -- हर्ष तारा सिंह 

लता या लतिका

आँखों में शरारत, अंदाज़ में बेबाकपन, जैसे कोई अल्हड़ बचपन ... ये शर्म-ओ-हया, हाथों की कपकपाहट, धड़कनों की घबराहट, उसपर एक सुंदर प्यारी मुस्कराहट ... हाय तौबा ये उसका शबाब, खुशबू जैसे बगिया गुलाब, उसकी सादगी में भी ताज़गी ... ये अद्भुत नज़राना, कौन हो तुम, लता या लतिका, सुरसुन्दरी, परी या देवांगना ... तुमको खुदा ने बनाया है, या खुदा खुद को ही, ज़मीन पर ले आया है ... -- हर्ष तारा सिंह  ------ शब्दकोश------ बेबाकपन: निडरता  अल्हड: भोला  शबाब: जवानी  लता: अप्सरा  लतिका: आकाशिय अप्सरा 

मुस्कुराता चेहरा 😊

नींद खुलती है किसी ख्वाब से लड़ते हुए, एक मुस्कुराता चेहरा याद आता है जहन में चलते हुए । उबलने लगते हैं दिल में ख्वाब कई सारे, वो मुझसे पूछता है क्यूँ सवाल इतने सारे । हर पन्ना पलटता है माजी की किताब का, और हिसाब करता है मेरे हर गुनाह का । मुझसे जिरह भी करता है मेरी ही ओर से, फिर अपना फैसला सुनाता है जोर से । जला दो, दफन कर दो, या गम-ए-दुनिया में मिला दो, मेरी उन कशमकश यादों को चाहे दिल के हर पन्ने से मिटा दो । छिपा दो चाहे तुम मुझे किसी भी रोशनाई से, अपनी कहानियां लिखोगे तुम मेरी ही सिपाही से ।। -- हर्ष तारा सिंह  ------ शब्दकोश------ माजी: बीता कल  जिरह: हुज्जत करना  रोशनाई: स्याही, उजाला  सिपाही: अंधेरा