कभी कभी जी करता है

कभी कभी जी करता है, 
तुम्हें अपनी बाहों में कैद कर लूं ।

कभी कभी जी करता है , 
तेरे दामन में सिर रख दो पल रो लूँ ।

कभी कभी जी करता है , 
तेरी जुल्फों में छिप सवेरे को शाम कर दूँ ।

लेकिन जब जब जी करता है , 
तब तब दिमाग कुछ यूं बयान करता है ।

अगर वो बाहों में कैद हो भी गए ,
तो उस कैदी को और जुर्म करने से रोक पाओगे कैसे?

अगर उसके दामन में दो पल रो भी लिए ,
तो उसके पहले से गिले दामन में तुम तैर पाओगे कैसे?

अगर उसकी जुल्फों में छिप भी गए ,
तो उनकी काली घटाओं से खुद को बचा पाओगे कैसे?


-- हर्ष तारा सिंह 

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