आज तुम्हें अपने शब्दों में लिखतें हैं

क्यूँ न आज तुम्हें अपने शब्दों में लिखतें हैं
तुम्हारी आँखों को अपनी मुहब्बत लिखतें हैं

नज़रें!!! जो झुकती हैं कभी इत्तेफ़ाक़ से मुझे देखकर
तुम्हारी हया को अपनी बढ़ती धड़कन लिखते हैं

धड़कन!!! जो बढ़ती है इक तेरे पास होने से
तेरे इंतज़ार को अपनी तलब लिखतें हैं

तेरी हँसी से जो रहते हैं शादाब-ए-गुलिस्तान
उस बहार में तुझको जमाल-ए-याख लिखते हैं

लिखतें हैं तुझे ख़्याल-ओ-ख़्वाब से परे
हद्द-ए-नज़र से तुझे अपना आसमान लिखतें हैं

क्यूँ न आज तुम्हें अपने शब्दों में लिखतें हैं
तुम्हारी आँखों को अपनी मुहब्बत लिखतें हैं

-- हर्ष तारा सिंह 

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