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काश कोई समझें जज़्बात इस दुनियाँ में

काश कोई समझें जज़्बात इस दुनियाँ में हर कोई छोड़ देता हैं हाथ इस दुनियाँ में होते हैं कई लोग हर शाम इस महफ़िल में सुबहें छोड़ देते हैं सब साथ इस दुनियाँ में शायद सो जाउ तो कुछ राहत मिले मेरे ख़्यालों को पर हुई नहीं ना जाने क्यों रात इस दुनियाँ में मुकम्मल था एक जहां तेरे होने से देख अब कोई नहीं तेरे बाद इस दुनियाँ में वैसे तो पहलें भी हुए हैं कई लोग बेवफ़ा पर अब होती है सिर्फ़ तेरी बात इस दुनियाँ में

एक दोस्त थी मेरी ☹️

एक दोस्त थी मेरी, जो मेरे चेहरे की मुस्कान थी जिससे लगभग हर रोज बातें हो जाती थी  जो बनकर हँसी मेरे चेहरे पर आ जाती थी  जो करती थी कद्र और फिक्र मेरी  वो एक प्यारी सी लड़की थी दोस्त मेरी  उसकी बातों से सुकून सा मिल जाता था  जब वो नहीं करती थी बात तो दिल उदास सा हो जाता है  जब वो करती थी बात तो दिल उसकी बातों में खो जाता था  वक्त का पता ही नहीं चलता था जब उससे बात होती थी  उसके ही मैसेज से सुबह होती उसी के मैसेज से रात आती थी  ढेर सारा मजाक होता था,  मुझे बस उससे ही बातें करने का मन होता था  वो जब भी उदास होती थी तो मुझे बहुत अजीब सा लगता था  वो मुझसे बहुत दूर रहती थी पर फिर भी सब करीब सा लगता था  ऐसा नहीं है कि हमारे बीच लड़ाइयाँ नहीं होती थी  पर जितना वो जानती थी मुझे कोई और नहीं जानता था  बस एक दुआ थी कि हमारी दोस्ती यूंही बरकरार रहे  वो एक दोस्त थी मेरी, जो अब कहीं खो गयी!!

हाँ पहाड़ों पर इश्क़ फरमाया हमने 🥰

हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने,  बहुत दूर तक साथ चले,  बहुत देर तक साथ चले,  हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने... चलते चलते जब मेरी छोटी उँगली तुम्हारे हाथो से टकराई  तो लगा के मेरे ख़्याबों को एक सहमा असमां मिल गया हो,  बैठे हुए गाड़ी में वो तिरछी निगाह से तुम्हें देखा  तो पहाड़ कुछ फीके से लगने लगे। वो वहाँ तक चले जाने की ज़िद,  जहाँ शायद पहले जाने की हिम्मत नहीं थी,  तुम वहाँ भी लेकर चले गए मैं वहाँ भी चला गया।  पहाड़ के सबसे ऊँचे पेड़ पर बैठ कर  हम दोनो ने अपने अपने घर ये कह के बाँट लिए  कि तुम भी आना कभी दीवार लांघ कर मेरे खेतों की सब्जियाँ खाना,  मैं भी इस उमीद में खुश सा हो गया  कि शायद ये सफ़ेद पेड़ वाला घर अपना हो जाए कभी। सब कुछ तय करने के बाद जब वापस उतरे पहाड़ से  तो ऐसा लगा वो घर किराए का था बस कुछ पल का और वो पीछे छूट गया,  जैसे जैसे पहाड़ ढलते गए,  तुम और मैं डरे हुए सहमे हुए सच्चाई से रूबरू  एक दूसरे को समझाने लगे  कि हाँ हम पहाड़ पे रहते नहीं घूमने आते है,  छूट गयी वो बातें...

बचपन को याद करते हुए एक नज़्म

वो बचपन की शाम अब तक उधार है, अपने खिलौने देखे बिना जी बेक़रार है, ना थी फ़िक्र ग़म की ना ख़ौफ़ किसी बात का, चारों तरफ ही बस खुशियों का बाज़ार है, खेल-कूद से ही ज़िन्दगी का मक़सद था, वो सौंधी सी मिट्टी कितनी खुशबूदार है, गिरकर उठना और फिर उठकर दौड़ना, अब कहाँ वो हिम्मत और हौसला बरक़रार है, चोट लगने पे फूट-फूटकर रोते रहते, यूँही नहीं आज बदन पे घाव हज़ार है, ज़िद थी कि बस यही और यही चाहिए, दिल है कि अब हर चीज़ पे समझदार है, लिपट जाते थे माँ के आँचल से हम, और फिर लगता था की दुनिया बेकार है, स्कूल में भी कहाँ मन लगता था अपना, आख़िर कब छुट्टी होगी बस इसका इंतेज़ार है, वो दोस्त-अहबाब जो पल में रूठ जाते थे, उनसे ही तो ज़िंदगी में आज भी प्यार है, कोई लौटा दे वो ख़ूबसूरत बचपन मेरा, सदियों से ये दिल जिसका तलबगार है... बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !!

बांसगाँव का इतिहास ! 300 वर्षों से चली आ रही अनोखी परंपरा

कुल की रक्षा के लिए हम सर तक अपना कटवा देते है, सर के कटने पर भी हम धड़ से तलवार चलाते हैं, और हम उस कुल के वंशज है जिस कुल में. माँ भवानी के चरणों में किसी निर्बल की बलि नहीं , अपना उमड़ता हुआ गर्म रक्त चढ़ाते है ! भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गोरखपुर जिले का एक कस्बा और नगर पंचायत है । यह यहां बसे राजपूतों के लिए जाना जाता है। मूल रूप से, यह कहा जाता है कि इस स्थान पर प्राचीन काल में श्रीनेत राजपूतों का कब्जा था, जो अभी भी कुलदेवी के प्राचीन मंदिर में स्वरक्त बलिदान (रक्त) चढ़ाने के लिए अश्विन के महीने में इकट्ठा होकर अपनी विजय का जश्न मनाते हैं। श्रीनेत राजपूत मूल रूप से श्रीनगर, उत्तराखंड के निवासी हैं। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि श्रीनेत वंश के किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को राजा विक्रमादित्य ने ये पदवी दी थी जिससे यहां के लोग "शिरनेत" या  "श्रीनेत" कहे जाने लगे । कई पीढ़ियों के बाद चंद्रभाल के वंशज मकरंद सिंह श्रीनगर से गोरखपुर आए, यहाँ इन्हें रियासतों से बहुत से गाँव मिले जब इनका खानदान बढ़ा तब ये और भी गाँवों में फैलने लगे और यहां के लोग बांसगाँव के बाबू साहब क...

काश तू भी मेहमान की तरह आया होता

काश तू भी मेहमान की तरह आया होता रंजिशों का दौर यूं न कभी आया होता। दिल था जिद किसी बात पे कर बैठा दिल को किसी ने तो कुछ समझाया होता। हमने दर्द को लफ़्ज़ों का जामा दे दिया थोड़ा सलीके से तू भी तो पेश आया होता। पहले कभी इस कद्र तन्हा नही हुए थे हम काश दर्द दिल का लबों पे न आया होता। मै उजाले शहर के इस घर तक लाता कैसे पर्दा शब ए ग़म से भी तो उठाया होता। कोई समझा न समझेगा हर्ष तुझको अपने आप को आप ही समझाया होता।

प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी

प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी। हाँ सखे पीड़ा मिलेगी, बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी! आज बंधन लग रहें जो वह तो केवल एक मृषा है, मोह का अलोक है यह देह की किंचित तृषा है। नित्य भय मे बांधे रखे अल्प मृत्यु द्वार है यह, मेनका की छल कथा का बस समझ लो सार है यह। हो ना पाए बुद्ध गर तुम और लिप्सा में समाए, स्वयं से केवल द्वंद होगा अश्कों की क्रीड़ा मिलेगी। प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी। सुख समझते हो जिसे तुम कष्ट का कारक बनेगा, आत्मा के पोर रिस कर पीर का वाहक बनेगा। बुन लिया जो तुमने जीवन स्वार्थ और आसानियो में, श्वास अंतिम तुम भरोगे देखना फिर ग्लानियों में। चित्त स्थिर कर न पाए यदि जगत की लालसा में, फिर तुम्हें अनहद दुखों की महज़ बीड़ा मिलेगी। प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी। फूलते हो आज बल पर कल अशक्ति, दीन होगे, त्याग देगा प्राण तन को फड़फड़ती मीन होगे। कामना ऐसी ज़हर है इंद्रियों को मार देगी, भ्रष्ट कर देगी ह्रदय को लोभ को आगर देगी। स्वल्प जीवन की सनातन आत्मा दूषित हुई गर, फिर किसी भागीरथी से भी नहीं तृणा मिलेगी। प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड...