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बांसगाँव का इतिहास ! 300 वर्षों से चली आ रही अनोखी परंपरा

कुल की रक्षा के लिए हम सर तक अपना कटवा देते है, सर के कटने पर भी हम धड़ से तलवार चलाते हैं, और हम उस कुल के वंशज है जिस कुल में. माँ भवानी के चरणों में किसी निर्बल की बलि नहीं , अपना उमड़ता हुआ गर्म रक्त चढ़ाते है ! भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गोरखपुर जिले का एक कस्बा और नगर पंचायत है । यह यहां बसे राजपूतों के लिए जाना जाता है। मूल रूप से, यह कहा जाता है कि इस स्थान पर प्राचीन काल में श्रीनेत राजपूतों का कब्जा था, जो अभी भी कुलदेवी के प्राचीन मंदिर में स्वरक्त बलिदान (रक्त) चढ़ाने के लिए अश्विन के महीने में इकट्ठा होकर अपनी विजय का जश्न मनाते हैं। श्रीनेत राजपूत मूल रूप से श्रीनगर, उत्तराखंड के निवासी हैं। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि श्रीनेत वंश के किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को राजा विक्रमादित्य ने ये पदवी दी थी जिससे यहां के लोग "शिरनेत" या  "श्रीनेत" कहे जाने लगे । कई पीढ़ियों के बाद चंद्रभाल के वंशज मकरंद सिंह श्रीनगर से गोरखपुर आए, यहाँ इन्हें रियासतों से बहुत से गाँव मिले जब इनका खानदान बढ़ा तब ये और भी गाँवों में फैलने लगे और यहां के लोग बांसगाँव के बाबू साहब क...

काश तू भी मेहमान की तरह आया होता

काश तू भी मेहमान की तरह आया होता रंजिशों का दौर यूं न कभी आया होता। दिल था जिद किसी बात पे कर बैठा दिल को किसी ने तो कुछ समझाया होता। हमने दर्द को लफ़्ज़ों का जामा दे दिया थोड़ा सलीके से तू भी तो पेश आया होता। पहले कभी इस कद्र तन्हा नही हुए थे हम काश दर्द दिल का लबों पे न आया होता। मै उजाले शहर के इस घर तक लाता कैसे पर्दा शब ए ग़म से भी तो उठाया होता। कोई समझा न समझेगा हर्ष तुझको अपने आप को आप ही समझाया होता।

प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी

प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी। हाँ सखे पीड़ा मिलेगी, बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी! आज बंधन लग रहें जो वह तो केवल एक मृषा है, मोह का अलोक है यह देह की किंचित तृषा है। नित्य भय मे बांधे रखे अल्प मृत्यु द्वार है यह, मेनका की छल कथा का बस समझ लो सार है यह। हो ना पाए बुद्ध गर तुम और लिप्सा में समाए, स्वयं से केवल द्वंद होगा अश्कों की क्रीड़ा मिलेगी। प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी। सुख समझते हो जिसे तुम कष्ट का कारक बनेगा, आत्मा के पोर रिस कर पीर का वाहक बनेगा। बुन लिया जो तुमने जीवन स्वार्थ और आसानियो में, श्वास अंतिम तुम भरोगे देखना फिर ग्लानियों में। चित्त स्थिर कर न पाए यदि जगत की लालसा में, फिर तुम्हें अनहद दुखों की महज़ बीड़ा मिलेगी। प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड़ा मिलेगी। फूलते हो आज बल पर कल अशक्ति, दीन होगे, त्याग देगा प्राण तन को फड़फड़ती मीन होगे। कामना ऐसी ज़हर है इंद्रियों को मार देगी, भ्रष्ट कर देगी ह्रदय को लोभ को आगर देगी। स्वल्प जीवन की सनातन आत्मा दूषित हुई गर, फिर किसी भागीरथी से भी नहीं तृणा मिलेगी। प्रेम के अंतिम चरण में बस तुम्हें पीड...

अद्भुत जिंदगी !

यदि आपने :  बखरी की कोठरी के ताखा में जलती ढेबरी देखी है। दलान को समझा है। ओसारा जानते हैं। दुवारे पर कचहरी (पंचायत) देखी है। राम राम के बेरा दूसरे के दुवारे पहुंच के चाय पानी किये हैं। दतुअन किये हैं। दिन में दाल-भात-तरकारी खाये हैं। संझा माई की किरिया का मतलब समझते हैं। रात में दिया और लालटेम जलाये हैं। बरहम बाबा का स्थान आपको मालूम है। डीह बाबा के स्थान पर गोड़ धरे हैं। ताल के किनारे और बगइचा के बगल वाले पीपर और स्कूल के रस्ता वाले बरगद के भूत का किस्सा (कहानी) सुने हैं। बसुला समझते हैं। फरूहा जानते हैं। कुदार देखे हैं। दुपहरिया मे घूम-घूम कर आम, जामुन, अमरूद खाये हैं। बारी बगइचा की जिंदगी जिये हैं। चिलचिलाती धूप के साथ लूक के थपेड़ों में बारी बगइचा में खेले हैं। पोखरा-गड़ही किनारे बैठकर लंठई किये हैं। पोखरा-गड़ही किनारे खेत में बैठकर 5-10 यारों की टोली के साथ कुल्ला मैदान हुए हैं। गोहूं, अरहर, मटरिया का मजा लिये हैं अगर आपने जेठ के महीने की तीजहरिया में तीसौरी भात खाये हैं, अगर आपने सतुआ का घोरुआ पिआ है, अगर आपने बचपन में बकइयां घींचा है। अगर आपने गाय को पगुराते हुए देखा है। अगर ...

बचपन लौटा दो!

फिसल गया जो हाथ से वो वक़्त मुझे लौटा दो,  हे महादेव! वरना मेरी यादों से मेरा बचपन मिटा दो। बेफिक्र घूमता देख इनको बेइंतहा रश्क करता हूँ , मुझे तुम इन बच्चों के संग फिर से बच्चा बना दो। मिट्टी के मर्तबान में उन सिक्कों की धुन याद है,  यादों की गुल्लक से चंद लम्हें मुझे और दिला दो।  वो रंगीन बर्फ के ठेले, चाचा के चाट का स्वाद,  फिर जिंदगी का वही पुराना लज्जत वापस चखा दो।  हर वक़्त परेशान रहता हूं, खुद से बातें करता हूं,  मुझे इस दुनियादारी की बीमारी का इलाज बता दो।  तू रख मेरा सब कुछ, लेले मेरी सारी खुशियां,  बस एक बार उन गुज़िश्ता सालों को जिंदा करा दो। 

सुनो!

सुनो ! हाँ तुम्हारे मैसेज का ही इन्तज़ार रहता है  गुज़रते हो जब तुम इन आँखों के सामने से  तो ये नज़रे तुम पर आकर ठहर जाती है  और जिस अदा से तुम छुप छुप के देखा करते हो ना  कसम खुदा की मुझे खुद से मुहब्बत हो जाती है  हाँ तुम्हारे एक View के लिए अक्सर मेरे Whatsapp का status लगता है  और हाँ जो तुम ये पूछते हो ना कि ये किसके लिए लिखा  तो हाँ वो तुम्हारे लिए ही लिखा होता है  मैं ये नहीं जानता कि तुम मेरे लिए क्या हो बस इतना समझ जाओ  मैं डूब जाऊँ जिन ख्यालों में उन ख़्यालों की एक वजह हो तुम कभी कभी जी करता है, तुम्हें अपनी बाहों में कैद कर लूं । कभी कभी जी करता है , तेरे दामन में सिर रख दो पल रो लूँ । कभी कभी जी करता है , तेरी जुल्फों में छिप सवेरे को शाम कर दूँ । लेकिन जब जब जी करता है , तब तब दिमाग कुछ यूं बयान करता है । अगर वो बाहों में कैद हो भी गए ,  तो उस कैदी को और जुर्म करने से रोक पाओगे कैसे? अगर उसके दामन में दो पल रो भी लिए , तो उसके पहले से गिले दामन में तुम तैर पाओगे कैसे? अगर उसकी जुल्फों में छिप भी गए , तो उनकी काली घटाओं से खु...

तुम धड़कन बनोगी क्या?

मैं चाहकर भी नहीं बोल पाता जो, तुम मेरी वो अधूरी बात बनोगी क्या? चुपचाप सा हूँ मैं बहुत, तुम अल्फाज़ बनोगी क्या? फीके से है होंठ मेरे, इनकी मुस्कुराहट बनोगी क्या? एक प्यारा सा दिल है मेरे पास, तुम धड़कन बनोगी क्या ? कुछ सपने है मेरे पास, उनकी उड़ान बनोगी क्या? तेरे हिस्से के ग़म मैं सह लूँगा, तुम मेरी ख़ुशी बनोगी क्या ? दर्द बहुत है मेरे जीवन में, तुम हमदर्द बनोगी क्या? वादे तो सभी हजार करते हैं, तुम निभाने वाली बनोगी क्या? मैं जिद्दी बहुत हूँ, तुम मेरी जिद बनोगी क्या? मुझे नींद बहुत कम आती है, तुम सुलाने वाली बनोगी क्या? मुझे तुम्हें बेइंतहा मुहब्बत है, तुम भी मुझसे करोगी क्या? अकेला चलने वाला मुसाफिर हूँ मैं, मेरी हमसफर बनोगी क्या?