काश तू भी मेहमान की तरह आया होता
काश तू भी मेहमान की तरह आया होता रंजिशों का दौर यूं न कभी आया होता। दिल था जिद किसी बात पे कर बैठा दिल को किसी ने तो कुछ समझाया होता। हमने दर्द को लफ़्ज़ों का जामा दे दिया थोड़ा सलीके से तू भी तो पेश आया होता। पहले कभी इस कद्र तन्हा नही हुए थे हम काश दर्द दिल का लबों पे न आया होता। मै उजाले शहर के इस घर तक लाता कैसे पर्दा शब ए ग़म से भी तो उठाया होता। कोई समझा न समझेगा हर्ष तुझको अपने आप को आप ही समझाया होता।