यूँ ही
कभी कभी कुछ याद कर लिया करो यूं ही
वीरानों को आबाद कर लिया करो यूं ही।
इस मरकज़ मे न रह जाऊं कहीं तन्हा
चश्म ए नम दीदार कर लिया करो यूं ही।
मांजिलों से कोई क्या गिला शिकवा
चलते चलते याद कर लिया करो यूं ही।
अपने मरासिम मे कोई कमी होगी
खिलवत मे फ़रियाद कर लिया करो यूं ही।
मुद्दत से वहशत दिल की नही जाती
ख्यालों से आजाद कर लिया करो यूं ही।
फक्त हमीं तो न थे वाकिफ रस्तों से
रुख कभी इस पार कर लिया करो यूं ही।
हमने कब तुझको जंजीर किया
कभी कोई इकरार कर लिया करो यूं ही।
-- हर्ष तारा सिंह
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