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कैसे कहें कितने खास हो तुम!

कैसे कहें कितने ख़ास हो तुम, कि प्यार का एहसास हो तुम। सागर घूंट में पी लिया फिर भी, बुझती नहीं, वो प्यास हो तुम। फासले मीलों के रहे दरमियां, दिल में रहते हो पास हो तुम। अंधेरी रात में रौशनी करे जो, जलते दिए सी आस हो तुम। बेस्वाद ज़िन्दगी थी पहले मेरी, तुम आए लगा मिठास हो तुम। यूं फ़ना हुए तेरी मुहब्बत में कि, मेरी इस रूह का लिबास हो तुम।

हर रात चाँदनी होती !

उन सर्द रातों की सिहरन में तुम्हारे मुखड़े की रोशनी होती। तुम होते तो दिन सुनहरे होते और हर रात चाँदनी होती।। अधर रखो अपने, मेरे अधरों पर अब इतने भी सवाल ना करो। बाहों की चादर में सिमट जाओ रिवाजों का ना ख्याल करो। नींद, सपने, वस्ल, इरादे, वादे इन सब से दुश्मनी  होती। तुम होते तो दिन सुनहरे होते और हर रात चाँदनी होती। मेरी साँसों को तुमने साँसें दे कर मेरे भीतर का अनहद चूम लिया। तुझ संग मेरा नाम जुड़ जाने से मेरा हर अधूरापन झूम लिया। जब आँखों में जगते इक-दूजे के हमारी सारी बातें रेशमी होती। तुम होते तो दिन सुनहरे होते और हर रात चाँदनी होती ।

तुम फिर मिलना मुझे !

सच पूछो तो "तुम्हारा यूँ अचानक से चले जाने की ख़बर, ऐसे लगा जैसे गंगा आरती के बाद घाट का सूनापन" वक्त शायद फिर करवट ले , शायद हम फिर कभी मिलें , कब ? कैसे ? कहां ? कुछ नहीं पता, पर जब हम मिलेंगे तब मैं देखूंगा सच बोलती तुम्हारी उम्मीद भरी आंखों को , झूठ बोलते तुम्हरे उन रूखे लफ्ज़ों को, और बेबसी से थरथराते हुए मेरे मन को। अगर मैं हँस दूं तो समझना कि वो एक छलावा है, अगर मुस्कुरा दूं तो समझना तुम्हारे साथ की खुशी, अगर चुप बैठा रहूं तो समझना की बहुत कुछ कहना है, हां शायद वक्त भी कम पड़ जाए , पर अगर फ़िर कभी आना तो मिलना घड़ी की टिक टिक से परे। कम से कम इतना की वापस जाते वक्त तुम्हारे बालों की खुशबू रह जाए मेरी कमीज़ पर। "हां बस इतना..इतना ही।" कुल्हड़ की गर्म चाय, गंगा का पानी बनकर , तुम मिलना फिर मुझसे एक याद भरी कहानी बनकर.! तुम मिलना फिर मुझसे मेरे जीवन की एक निशानी बनकर.!

अज़ीब रिश्ता

हाँ ! मेरा रिश्ता सिर्फ जिस्मानी था तुमसे, शायद इसलिए मुझे अब तक याद हैं सिर्फ़ जिस्मानी चीजें, जैसे तुम्हारी उम्मीद भरी आँखें , तुम्हारे रूखे होंठ, तुम्हारे पैरो की वो उंगलियाँ और वो सुबह का अनसुलझे बालों वाला तुम्हारा हसीन चेहरा। हाँ मुझे इश्क़ तो नहीं तुमसे पर, किसी और के साथ तुम्हारे होने का खयाल,  एक अजीब तकलीफ़देह एहसास देता है, ठीक से बयां करने लायक भी नहीं.. की आखिर कैसा! कितना ! और क्यों है ये अजीब एहसास। बस एक अजीब सा अलगाव, एक बेचैनी है उन स्मृतियों में। जिस दिन तुम भागते भागते थक जाओगे इस ज़िंदगी के खेल में , उस दिन एक शख़्स तुम्हारी थकी हुई आँखों पर फेरेगा अपनी उंगलियों को , उसका कंधा बनेगा तुम्हारी छत , और उसकी गोद तुम्हारा नर्म मखमली बिस्तर। तुम चुनना प्रेम के सबसे सरल रूप को, जो बड़े वचनों और सौगंध से रहित हो, जहाँ कोई छल, कोई बड़े वादे ना हों। तुम्हारे चेहरे पर बिखरती मुस्कान से, एक बार फ़िर "जी उठेगा ये हर्ष, पहले कि तरह !" ख़ुदा-ना-ख़्वास्ता कभी दोबारा इश्क़ हुआ तुम्हें , तो सबसे पहले तुम पूछ लेना बस एक बात, "कि घर वाले मान जायेंगे ना...?"

काश कोई समझें जज़्बात इस दुनियाँ में

काश कोई समझें जज़्बात इस दुनियाँ में हर कोई छोड़ देता हैं हाथ इस दुनियाँ में होते हैं कई लोग हर शाम इस महफ़िल में सुबहें छोड़ देते हैं सब साथ इस दुनियाँ में शायद सो जाउ तो कुछ राहत मिले मेरे ख़्यालों को पर हुई नहीं ना जाने क्यों रात इस दुनियाँ में मुकम्मल था एक जहां तेरे होने से देख अब कोई नहीं तेरे बाद इस दुनियाँ में वैसे तो पहलें भी हुए हैं कई लोग बेवफ़ा पर अब होती है सिर्फ़ तेरी बात इस दुनियाँ में

एक दोस्त थी मेरी ☹️

एक दोस्त थी मेरी, जो मेरे चेहरे की मुस्कान थी जिससे लगभग हर रोज बातें हो जाती थी  जो बनकर हँसी मेरे चेहरे पर आ जाती थी  जो करती थी कद्र और फिक्र मेरी  वो एक प्यारी सी लड़की थी दोस्त मेरी  उसकी बातों से सुकून सा मिल जाता था  जब वो नहीं करती थी बात तो दिल उदास सा हो जाता है  जब वो करती थी बात तो दिल उसकी बातों में खो जाता था  वक्त का पता ही नहीं चलता था जब उससे बात होती थी  उसके ही मैसेज से सुबह होती उसी के मैसेज से रात आती थी  ढेर सारा मजाक होता था,  मुझे बस उससे ही बातें करने का मन होता था  वो जब भी उदास होती थी तो मुझे बहुत अजीब सा लगता था  वो मुझसे बहुत दूर रहती थी पर फिर भी सब करीब सा लगता था  ऐसा नहीं है कि हमारे बीच लड़ाइयाँ नहीं होती थी  पर जितना वो जानती थी मुझे कोई और नहीं जानता था  बस एक दुआ थी कि हमारी दोस्ती यूंही बरकरार रहे  वो एक दोस्त थी मेरी, जो अब कहीं खो गयी!!

हाँ पहाड़ों पर इश्क़ फरमाया हमने 🥰

हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने,  बहुत दूर तक साथ चले,  बहुत देर तक साथ चले,  हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने... चलते चलते जब मेरी छोटी उँगली तुम्हारे हाथो से टकराई  तो लगा के मेरे ख़्याबों को एक सहमा असमां मिल गया हो,  बैठे हुए गाड़ी में वो तिरछी निगाह से तुम्हें देखा  तो पहाड़ कुछ फीके से लगने लगे। वो वहाँ तक चले जाने की ज़िद,  जहाँ शायद पहले जाने की हिम्मत नहीं थी,  तुम वहाँ भी लेकर चले गए मैं वहाँ भी चला गया।  पहाड़ के सबसे ऊँचे पेड़ पर बैठ कर  हम दोनो ने अपने अपने घर ये कह के बाँट लिए  कि तुम भी आना कभी दीवार लांघ कर मेरे खेतों की सब्जियाँ खाना,  मैं भी इस उमीद में खुश सा हो गया  कि शायद ये सफ़ेद पेड़ वाला घर अपना हो जाए कभी। सब कुछ तय करने के बाद जब वापस उतरे पहाड़ से  तो ऐसा लगा वो घर किराए का था बस कुछ पल का और वो पीछे छूट गया,  जैसे जैसे पहाड़ ढलते गए,  तुम और मैं डरे हुए सहमे हुए सच्चाई से रूबरू  एक दूसरे को समझाने लगे  कि हाँ हम पहाड़ पे रहते नहीं घूमने आते है,  छूट गयी वो बातें...