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Showing posts from November, 2022

काश कोई समझें जज़्बात इस दुनियाँ में

काश कोई समझें जज़्बात इस दुनियाँ में हर कोई छोड़ देता हैं हाथ इस दुनियाँ में होते हैं कई लोग हर शाम इस महफ़िल में सुबहें छोड़ देते हैं सब साथ इस दुनियाँ में शायद सो जाउ तो कुछ राहत मिले मेरे ख़्यालों को पर हुई नहीं ना जाने क्यों रात इस दुनियाँ में मुकम्मल था एक जहां तेरे होने से देख अब कोई नहीं तेरे बाद इस दुनियाँ में वैसे तो पहलें भी हुए हैं कई लोग बेवफ़ा पर अब होती है सिर्फ़ तेरी बात इस दुनियाँ में

एक दोस्त थी मेरी ☹️

एक दोस्त थी मेरी, जो मेरे चेहरे की मुस्कान थी जिससे लगभग हर रोज बातें हो जाती थी  जो बनकर हँसी मेरे चेहरे पर आ जाती थी  जो करती थी कद्र और फिक्र मेरी  वो एक प्यारी सी लड़की थी दोस्त मेरी  उसकी बातों से सुकून सा मिल जाता था  जब वो नहीं करती थी बात तो दिल उदास सा हो जाता है  जब वो करती थी बात तो दिल उसकी बातों में खो जाता था  वक्त का पता ही नहीं चलता था जब उससे बात होती थी  उसके ही मैसेज से सुबह होती उसी के मैसेज से रात आती थी  ढेर सारा मजाक होता था,  मुझे बस उससे ही बातें करने का मन होता था  वो जब भी उदास होती थी तो मुझे बहुत अजीब सा लगता था  वो मुझसे बहुत दूर रहती थी पर फिर भी सब करीब सा लगता था  ऐसा नहीं है कि हमारे बीच लड़ाइयाँ नहीं होती थी  पर जितना वो जानती थी मुझे कोई और नहीं जानता था  बस एक दुआ थी कि हमारी दोस्ती यूंही बरकरार रहे  वो एक दोस्त थी मेरी, जो अब कहीं खो गयी!!

हाँ पहाड़ों पर इश्क़ फरमाया हमने 🥰

हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने,  बहुत दूर तक साथ चले,  बहुत देर तक साथ चले,  हाँ पहाड़ों पे इश्क़ फ़रमाया हमने... चलते चलते जब मेरी छोटी उँगली तुम्हारे हाथो से टकराई  तो लगा के मेरे ख़्याबों को एक सहमा असमां मिल गया हो,  बैठे हुए गाड़ी में वो तिरछी निगाह से तुम्हें देखा  तो पहाड़ कुछ फीके से लगने लगे। वो वहाँ तक चले जाने की ज़िद,  जहाँ शायद पहले जाने की हिम्मत नहीं थी,  तुम वहाँ भी लेकर चले गए मैं वहाँ भी चला गया।  पहाड़ के सबसे ऊँचे पेड़ पर बैठ कर  हम दोनो ने अपने अपने घर ये कह के बाँट लिए  कि तुम भी आना कभी दीवार लांघ कर मेरे खेतों की सब्जियाँ खाना,  मैं भी इस उमीद में खुश सा हो गया  कि शायद ये सफ़ेद पेड़ वाला घर अपना हो जाए कभी। सब कुछ तय करने के बाद जब वापस उतरे पहाड़ से  तो ऐसा लगा वो घर किराए का था बस कुछ पल का और वो पीछे छूट गया,  जैसे जैसे पहाड़ ढलते गए,  तुम और मैं डरे हुए सहमे हुए सच्चाई से रूबरू  एक दूसरे को समझाने लगे  कि हाँ हम पहाड़ पे रहते नहीं घूमने आते है,  छूट गयी वो बातें...

बचपन को याद करते हुए एक नज़्म

वो बचपन की शाम अब तक उधार है, अपने खिलौने देखे बिना जी बेक़रार है, ना थी फ़िक्र ग़म की ना ख़ौफ़ किसी बात का, चारों तरफ ही बस खुशियों का बाज़ार है, खेल-कूद से ही ज़िन्दगी का मक़सद था, वो सौंधी सी मिट्टी कितनी खुशबूदार है, गिरकर उठना और फिर उठकर दौड़ना, अब कहाँ वो हिम्मत और हौसला बरक़रार है, चोट लगने पे फूट-फूटकर रोते रहते, यूँही नहीं आज बदन पे घाव हज़ार है, ज़िद थी कि बस यही और यही चाहिए, दिल है कि अब हर चीज़ पे समझदार है, लिपट जाते थे माँ के आँचल से हम, और फिर लगता था की दुनिया बेकार है, स्कूल में भी कहाँ मन लगता था अपना, आख़िर कब छुट्टी होगी बस इसका इंतेज़ार है, वो दोस्त-अहबाब जो पल में रूठ जाते थे, उनसे ही तो ज़िंदगी में आज भी प्यार है, कोई लौटा दे वो ख़ूबसूरत बचपन मेरा, सदियों से ये दिल जिसका तलबगार है... बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !!