मुलाकात

तुमसे पहली सी मुलाक़ात कुछ इस तरह से थी
कि तुम थे जैसे ज्ञान का सागर
और मैं, एक खाली सी नदी।

तुमसे वो पहली सी बात उन तारों की छाओं में थी
जिनकी सुबह अभी बाकी थी।

तुम भाग दौड़ के बीच एक ठहराव से थे
तुमसे था एक अजीब सा ही सुकून;
तुम में रंग कुछ इस तरह से भरे थे
जैसे तुम्हारे वो प्रिये अमलतास के फ़ूल।

तुम कई कहानियां लिए चल रहे थे
तुम्हारा अपना एक काफ़िला था;
तुम खामोशी में भी यूँ खूबसूरत थे
जैसे उसका अपना एक अफ़साना था।

तुमसे मुलाक़ात रोज़ की ही दास्तान हो गयी,
ना जाने कब आंखों की गुफ़्तगू शब्दों से ज़्यादा कीमती हो गयी।
फ़िर हुआ वही जो हर कहानी में होता है,
अंत होना उसका निश्चित होता है।

तुमसे आखरी सी मुलाक़ात कुछ इस तरह से हुई
जैसे तुम थे ढ़लता सूरज
और मेरी सुबह कहीं और होनी थी।

तुमसे आख़री सी वो बात अधूरी सी थी
जहां कहानी या तो पूरी सी थी,
या फ़िर एक नए मोड़ की उम्मीद सी थी।

-- हर्ष तारा सिंह 

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