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तुम फिर मिलना मुझे !

सच पूछो तो "तुम्हारा यूँ अचानक से चले जाने की ख़बर, ऐसे लगा जैसे गंगा आरती के बाद घाट का सूनापन" वक्त शायद फिर करवट ले , शायद हम फिर कभी मिलें , कब ? कैसे ? कहां ? कुछ नहीं पता, पर जब हम मिलेंगे तब मैं देखूंगा सच बोलती तुम्हारी उम्मीद भरी आंखों को , झूठ बोलते तुम्हरे उन रूखे लफ्ज़ों को, और बेबसी से थरथराते हुए मेरे मन को। अगर मैं हँस दूं तो समझना कि वो एक छलावा है, अगर मुस्कुरा दूं तो समझना तुम्हारे साथ की खुशी, अगर चुप बैठा रहूं तो समझना की बहुत कुछ कहना है, हां शायद वक्त भी कम पड़ जाए , पर अगर फ़िर कभी आना तो मिलना घड़ी की टिक टिक से परे। कम से कम इतना की वापस जाते वक्त तुम्हारे बालों की खुशबू रह जाए मेरी कमीज़ पर। "हां बस इतना..इतना ही।" कुल्हड़ की गर्म चाय, गंगा का पानी बनकर , तुम मिलना फिर मुझसे एक याद भरी कहानी बनकर.! तुम मिलना फिर मुझसे मेरे जीवन की एक निशानी बनकर.!

अज़ीब रिश्ता

हाँ ! मेरा रिश्ता सिर्फ जिस्मानी था तुमसे, शायद इसलिए मुझे अब तक याद हैं सिर्फ़ जिस्मानी चीजें, जैसे तुम्हारी उम्मीद भरी आँखें , तुम्हारे रूखे होंठ, तुम्हारे पैरो की वो उंगलियाँ और वो सुबह का अनसुलझे बालों वाला तुम्हारा हसीन चेहरा। हाँ मुझे इश्क़ तो नहीं तुमसे पर, किसी और के साथ तुम्हारे होने का खयाल,  एक अजीब तकलीफ़देह एहसास देता है, ठीक से बयां करने लायक भी नहीं.. की आखिर कैसा! कितना ! और क्यों है ये अजीब एहसास। बस एक अजीब सा अलगाव, एक बेचैनी है उन स्मृतियों में। जिस दिन तुम भागते भागते थक जाओगे इस ज़िंदगी के खेल में , उस दिन एक शख़्स तुम्हारी थकी हुई आँखों पर फेरेगा अपनी उंगलियों को , उसका कंधा बनेगा तुम्हारी छत , और उसकी गोद तुम्हारा नर्म मखमली बिस्तर। तुम चुनना प्रेम के सबसे सरल रूप को, जो बड़े वचनों और सौगंध से रहित हो, जहाँ कोई छल, कोई बड़े वादे ना हों। तुम्हारे चेहरे पर बिखरती मुस्कान से, एक बार फ़िर "जी उठेगा ये हर्ष, पहले कि तरह !" ख़ुदा-ना-ख़्वास्ता कभी दोबारा इश्क़ हुआ तुम्हें , तो सबसे पहले तुम पूछ लेना बस एक बात, "कि घर वाले मान जायेंगे ना...?"