तुम फिर मिलना मुझे !
सच पूछो तो "तुम्हारा यूँ अचानक से चले जाने की ख़बर, ऐसे लगा जैसे गंगा आरती के बाद घाट का सूनापन" वक्त शायद फिर करवट ले , शायद हम फिर कभी मिलें , कब ? कैसे ? कहां ? कुछ नहीं पता, पर जब हम मिलेंगे तब मैं देखूंगा सच बोलती तुम्हारी उम्मीद भरी आंखों को , झूठ बोलते तुम्हरे उन रूखे लफ्ज़ों को, और बेबसी से थरथराते हुए मेरे मन को। अगर मैं हँस दूं तो समझना कि वो एक छलावा है, अगर मुस्कुरा दूं तो समझना तुम्हारे साथ की खुशी, अगर चुप बैठा रहूं तो समझना की बहुत कुछ कहना है, हां शायद वक्त भी कम पड़ जाए , पर अगर फ़िर कभी आना तो मिलना घड़ी की टिक टिक से परे। कम से कम इतना की वापस जाते वक्त तुम्हारे बालों की खुशबू रह जाए मेरी कमीज़ पर। "हां बस इतना..इतना ही।" कुल्हड़ की गर्म चाय, गंगा का पानी बनकर , तुम मिलना फिर मुझसे एक याद भरी कहानी बनकर.! तुम मिलना फिर मुझसे मेरे जीवन की एक निशानी बनकर.!